नोटबंदी में रद्द किये  किए गए नोटों का ९९.३ प्रतिशत वापस आ जाने के बाद यह साफ़ हो गया है कि इसके जरिये काला धन नष्ट करने का दावा गलत था।
अगर नोटबंदी से काली अर्थव्यवस्था में कमी नहीं आने वाली थी  और यह  स्पष्ट है कि सरकार यह बात जानती थो तो नोटबंदी की कवायद और कम नगदी-आधारित अर्थव्यवस्था की बातों का वास्तविक मकसद क्या था?
वास्तविक मकसद भारत की अनौपचारिक ;यानि असंगठित क्षेत्र की अर्थव्यवस्था, खास तौर से खेती, लघु खुदरा व्यापार और लघु उद्योगों को ध्वस्त करना था। मीडिया प्रचार के चलते ‘मोदी भक्त’ बन गए लोगों को यह बात शायद अविश्‍वसनीय लगे, मगर सारे तथ्य इसी ओर इशारा कर रहे हैं।
सत्ता में आने के बाद भाजपा ने चुनाव के दौरान किए गए सभी वादों से पूरी पलटी खाई है। वह वैश्‍वीकरणद व् उदारीकरण और निजीकरण की उन्हीं नीतियों पर चल रही है जिन्हें पिछले दो दशकों से देश में लागू किया जा रहा था  और वह भी ज्यादा रफ्तार से। इन नीतियों का क्रियान्वयन अमरीका जैसे विकसित देशों, तथा उनके द्वारा नियंत्रित अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं-विश्‍व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष  (आईएमएफ) के निर्देश पर किया जा रहा है। भारत सरकार इतनी मुस्तैदी से उनके निर्देशों पर अमल इसलिए कर रही है क्योंकि हमारे ऊपर भारी विदेशी कर्ज है, जो मोदी सरकार के काल में ४८५ अरब डॉलर तक जा पहुंचा है।  इन आर्थिक सुधारों का उद्देश्य भारतीय अर्थव्यवस्था का कॉर्पोरेटीकरण करना और देशी-विदेशी कॉर्पोरेट घरानों को अर्थव्यवस्था पर निर्णायक नियंत्रण स्थापित करने देना है। इसके लिए देश के विशाल असंगठित या अनौपचारिक क्षेत्र को नष्ट करना जरूरी है और वैश्‍वीकरण के नाम पर देश में चल रहे आर्थिक सुधारों के जरिए ठीक यही किया जा रहा है। भारत के अनौपचारिक क्षेत्र के तीन सबसे बड़े घटक हैं-
१)    कृषि क्षेत्र  जिस पर देश की ५३ प्रतिशत आबादी निर्भर है।
२)    लघु या असंगठित खुदरा क्षेत्र  जो कुल रोजगार में से ९ प्रतिशत का हिस्सेदार है।
३)    लघु या असंगठित उत्पादन (मैन्युफैक्चरिंग) क्षेत्र दृ जो कुल रोजगार में से ७.५ प्रतिशत का हिस्सेदार है।
ये सारे क्षेत्र वैसे भी वैश्‍वीकरण के तहत अस्तित्व के लिए जूझ रहे थे। और अब नोटबंदी  और नगदीविहीन अर्थव्यवस्था के नाम पर मोदी सरकार इन क्षेत्रों को और पंगु बना रही है। अपने उद्देश्यों को पाने के लिए प्रधान मंत्री चाहते  कि फुटपाथ पर चाय बेचने वाले या सड़क किनारे मछली बेचने वाले पीओएस मशीन द्वारा अपने दिहाड़ी मजदूर ग्राहक से क्रेडिट कार्ड से भुगतान प्राप्त करें  या ठेले पर फल बेचने वाले एक दर्जन केलों के दाम पेटीएम से लेंगे, या छोटे-छोटे कारखानों के मालिक अपने दिहाड़ी मजदूरों को इलेक्ट्रॉनिक ट्रान्सफर से मजदूरी का भुगतान करेंगे।
अमरीकी कॉर्पोरेशन्स के लाभार्थ
वैश्‍वीकरण के अंतर्गत क्रियान्वित की जा रही अन्य नीतियों के समान, इस नीति के पीछे भी वॉशिंगटन का ही हाथ है। यह बात हमारे पाठकों को शायद अविश्‍वसनीय लगे, किंतु इसके ठोस प्रमाण हैं। प्रधान मंत्री मोदी की नोटबंदी और नगदीविहीन मुहिम अमरीकी सरकार की विकास एजेंसी यूएसएड के निर्देश पर चलाई जा रही है।
जब से मोदी सरकार सत्ता में आई है, वह अमरीकी दबाव के आगे घुटने टेकती रही है और अमरीकी कॉर्पोरेशन्स को लाभान्वित करने वाली नीतियों पर अमल करती रही है। नोटबंदी का अभियान अमरीकी कॉर्पोरेट हितों के समक्ष समर्पण का ही एक और कदम था।
अक्टूबर २०१६ में यूएसएड और भारत के वित्त मंत्रालय के बीच एक समझौता हुआ था जिसका नाम है कैटालिस्ट: इंक्लूसिव कैशलेस पेमेंट पार्टनरशिप  इसका लक्ष्य था  भारत में नगदीविहीन भुगतान में जबरदस्त बढ़ोतरी करना। यह साझेदारी यूएसएड द्वारा २०१५ में कराए गए और जनवरी २०१६ में प्रस्तुत एक अध्ययन की रिपोर्ट पर आधारित है। इस रिपोर्ट का शीर्षक: बियॉण्ड कैश (नगद से आगे)। इस रिपोर्ट और उसके बाद की योजनाओं को गुप्त रखा गया।  इससे प्रधान मंत्री का वक्तव्य, कि नोटबंदी की तैयारियां कई महिनों से चल रही थीं, का वास्तविक अर्थ समझ में आ जाता है।
इस साझेदारी और नगदीविहीन अर्थव्यवस्था की ओर मुहिम के असली लाभार्थी कौन हैं इसका रहस्योद्‍घाटन यूएसएड ही करती है। बियॉण्ड कैश रिपोर्ट के प्रकाशन के बाद जारी प्रेस विज्ञप्ति में उसने कहा, “३५ से ज्यादा भारतीय, अमरीकी और अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने वित्त मंत्रालय और यूएसएड के साथ नगदीविहीन अर्थव्यवस्था की  पहल में साझेदारी की है।”  ये संगठन अधिकांशतः आईटी कंपनियां और भुगतान सेवा प्रदाता हैं, जो डिजिटल भुगतान में बढ़ोतरी और उससे जुड़े डेटा की उत्पत्ति से लाभान्वित होंगे। इनमें माइक्रोसॉफ्ट, मास्टरकार्ड और वीसा जैसी क्रेडिट कार्ड कंपनियां, इंटरनेट सेवा कंपनी ई-बे, वित्तीय सेवा कंपनी सिटीग्रुप, वगैरह शामिल हैं। अनुमानों के मुताबिक भारत के डिजिटल भुगतान उद्योग के २०२० तक ५०० अरब डॉलर तक पहुंचने की संभावना है, बशर्ते कि करोड़ों भारतीयों को डिजिटल भुगतान के जाल में घसीटा जा सके।
यूएसएड व उसकी साझेदार कॉर्पोरेशन्स यह बात भलीभांति जानती हैं कि यह नीति भारत के छोटे व्यापारियों और उत्पादनकर्ताओं और देश के दुर्गम इलाकों में रहने वाले लोगों को तबाह कर देगी। बियॉण्ड कैश में नोटबंदी के प्रभाव का विस्तृत विश्‍लेषण किया गया था।  मगर उन्हें परवाह नहीं है। आज की दुनिया, जिसमें बड़ी-बड़ी कॉर्पोरेशन्स का बोलबाला है, में सिर्फ अधिक से अधिक मुनाफा कमाने के बारे में सोचा जाता है, फिर चाहे वह मुनाफा लाखों गरीब और भूखे लोगों के खून से क्यों न सना हो।
तो चलिए, भारत के अनौपचारिक क्षेत्रों पर नोटबंदी  के असर की थोड़ा विस्तार से छानबीन करें।

कृषि पर असर 
भारत के अधिकांश कृषक छोटे किसान हैं जिनकी जोत के आकार एक हेक्टर से कम हैं। वैश्‍वीकरण के नाम पर कृषि क्षेत्र में जो सुधार लागू किए जा रहे हैं, उनका एक अहम उद्देश्य धीरे-धीरे इन छोटे किसानों का गला घोंटना है और उन्हें उनकी जमीनों से खदेड़ देना है, ताकि बड़ी कृषि कॉर्पोरेशन्स इन जमीनों को हथिया सकें। और इसीलिए एक के बाद एक सरकारें कृषि में सार्वजनिक निवेश लगातार कम करती गई हैं, खेती के लिए जरूरी चीजें (जैसे खाद, बिजली और सिंचाई) पर सबसिडियां कम करती गई हैं, कृषि उपज के लिए समर्थन (सार्वजनिक खरीद के रूप में) कम करती गई हैं, क्रमिक रूप से सार्वजनिक बैंकों द्वारा कृषि के लिए दिए जाने वाले ऋण पर सबसिडी घटाती गई हैं, और विकसित देशों से भारी सबसिडी युक्त कृषि उपज के आयात को अनुमति दे रही हैं। इन नीतियों ने देश की कृषि को गहरे संकट में धकेल दिया है और भारतीय किसानों को ऐसी हताशा में पटक दिया है कि ‘सुधार’ शुरू होने के बाद से ३ लाख से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं, जो इतिहास में मौतों की सबसे बड़ी आंधी है।
नोटबंदी  संभवतः छोटे किसानों के ताबूत में आखरी कील की तरह था।  इसकी घोषणा ऐन उस वक्त की गई जब खरीफ फसल काटी जा रही थी और रबी की फसल की बुआई शुरू होने वाली थी। इसने किसानों को मुश्किल परिस्थिति में धकेल दिया।

लघु खुदरा व्यापार पर असर
वैश्‍वीकरण के तहत एक और अहम नीतिगत सुधार यह किया जा रहा है कि भारत के खुदरा व्यापार क्षेत्र में विशाल बहुराष्ट्रीय खुदरा कंपनियों को प्रवेश की अनुमति दी जा रही है। सितंबर २०१३ में तत्कालीन यूपीए सरकार ने मल्टी-ब्रांड रिटेल में ५१ प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की अनुमति दी थी। भारत के खुदरा क्षेत्र में वालमार्ट, टेस्को, कैरेफोर और मेट्रो जैसी विशाल विदेशी खुदरा कंपनियों के प्रवेश से भारत के लघु खुदरा व्यापारियों का जनाजा निकल जाएगा। कारण यह है कि ये विदेशी खुदरा कंपनियां बहुत विशाल हैं, हमारी कल्पना से कहीं अधिक विशाल। उदाहरण के लिए, २००९-१० में अकेले वालमार्ट की कुल वैश्‍विक बिक्री ४०५ अरब डॉलर की थी, अर्थात अकेले वालमार्ट ने भारत के १.५ करोड़ खुदरा व्यापारियों की कुल बिक्री से ज्यादा माल बेचा था!
इन दैत्याकार विदेशी खुदरा व्यापारियों के पास जबर्दस्त वित्तीय ताकत है जिसके बल पर वे विश्‍व स्तर पर चीन जैसे सबसे सस्ते सप्लायर्स से माल प्राप्त कर सकते हैं। इसलिए, वे अपने उत्पाद छोटे खुदरा विक्रेताओं से कम दाम पर बेच सकते हैं। जरूरी हुआ तो वे नुकसान उठाकर भी माल बेचेंगे। सिर्फ किराना दुकानें और फेरी वाले ही धंधे से हाथ नहीं धो बैठेंगे, बल्कि थोक व्यापारियों और वितरकों का पूरा जाल विस्थापित हो जाएगा।  विकसित देशों में छोटे खुदरा व्यापारियों का लगभग सफाया हो चुका है। और उन सारे विकासशील देशों में वे विलुप्ति की कगार पर हैं जिन्होंने अपनी अर्थव्यवस्था को इन विशाल खुदरा कंपनियों के लिए खोला है।
भाजपा जब विपक्ष में थी, तो वह खुदरा क्षेत्र को एफडीआई के लिए खोले जाने के सख्त खिलाफ थी। अलबत्ता, सत्ता में आते ही उसने पलटी मारी है।
भारत का लघु खुदरा बाजार वैसे भी गंभीर आक्रमण का सामना कर रहा था,  नोटबंदी  और नगदीविहीन अर्थव्यवस्था की ओर कदम बढ़ाने से भारत के १.४९ करोड़ खुदरा दुकानें, जो दुनिया में सबसे अधिक हैं, का दम घुटने लगा है। भारत के एक सबसे बड़े व्यापारी संगठन कॉनफेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स के मुताबिक नवंबर ८ के दिन सरकार द्वारा नोटेबंदी की घोषणा के बाद से देश भर के बाजारों में कारोबार में ७५ प्रतिशत की जोरदार गिरावट आई।
असंगठित उत्पादन क्षेत्र पर असर
भारत ने जब १९९१ में वैश्‍वीकरण की शुरूआत की थी, तब से अर्थव्यवस्था में पश्‍चिमी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के जबर्दस्त प्रवेश के बावजूद, और भारतीय अर्थव्यवस्था के ७.३ प्रतिशत की वार्षिक दर से वृद्धि के बावजूद, २०००-२०१० के दशक में औपचारिक या संगठित उत्पादन क्षेत्र में बहुत कम नौकरियां पैदा हुईं। असंगठित उत्पादन क्षेत्र का मतलब है बहुत छोटी इकाइयां या घरेलू उत्पादन (इसमें कामगारों द्वारा अपने घर पर पापड़ या बीड़ी बनाना जैसे काम शामिल हैं में ही ज्यादा नौकरियां मिली हैं ।
हालांकि उत्पादन क्षेत्र की अधिकांश नौकरियां असंगठित क्षेत्र में ही हैं, फिर भी पिछले दो दशकों की वैश्‍वीकरण की नीतियों के कारण यह क्षेत्र अपने अस्तित्व के लिए जूझ रहा है। इन नीतियों में छोटी इकाइयों के लिए आरक्षण की समाप्ति और लघु क्षेत्र के लिए बैंक से कम ब्याज के ऋण की समाप्ति जैसी नीतियां शामिल हैं।
नोटबंदी में ८० प्रतिशत सूक्ष्म-लघु उद्यम बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। ये बहुत छोटी इकाइयां हैं और इनके आगे और पीछे अनेक कड़ियां जुड़ी होती हैं, जो सबकी सब नगद में होती हैं। नगदी सूख जाने के कारण ये उद्योग भयंकर संकट में फंस गए।  उदाहरण के लिए मुरादाबाद (उत्तर प्रदेश) के पीतल उद्योग को देखिए। पीतल के लिए कच्चा माल वे लोग सप्लाई करते हैं जो कबाड़े का धंधा करते हैं। वे जगह-जगह से कबाड़ा नगद में खरीदते हैं और उसे एक संग्राहक के पास बेचते हैं जो उसे नगद में खरीदता है। अगला कदम धातु की कतरनों को पिघलाने का होता है।  इसे पीतल की छड़ों या पटियों में ढाला जाता है। इसके बाद नंबर आता है सांचा जैसे गुलदस्ता या नल का सांचा बनाने का। पीतल को पिघलाकर इन सांचों में डाला जाता है। इसके बाद दस्तकार इन पर चित्र उकेरते हैं। फिर आते हैं घिसाई और रंग-रोगन के चरण। इनमें से प्रत्येक चरण शुद्ध रूप से नगद पर टिका है। हर मुकाम पर कामगार को किए गए काम के आधार पर रोजाना नगद भुगतान किया जाता है। कामगार रोज कमाते हैं, रोज खर्च करते हैं। इस उद्योग का कुल कारोबार ६,००० करोड़ रुपए का था, मगर नोटबंदी जनित नगदी के संकट ने इस फलते-फूलते उद्योग के पहिए थाम लिए हैं।
यही हाल लुधियाना के वस्त्र उद्योग, फिरोजाबाद के चूड़ी उद्योग, लखनऊ का चिकनकारी उद्योग और ऐसे अनेक उद्योगों का है जो लाखों लोगों को रोजगार देते हैं। हजारों इकाइयां बंद हो गईं,  लाखों कामगार बेरोजगार हो गए और गांव लौटने को मजबूर हो गए।
                  (  लेखक समाजवादी विचारक हैं और पुणे की ‘लोकायत’ नामक संस्था के संयोजक और वैचारिक अंग्रेजी साप्ताहिक ‘जनता’ के संपादक।  आईआईटी, बनारस से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में विशिष्टाता के साथ स्नातक की डिग्री लेने के बाद  से वह सामाजिक बदलाव के लिए पूर्णकालिक  रूप से कार्य करत्ते हैं।  )

Comments