इन दिनों भारत के डिजिटल होने पर काफी जोर है. डिजिटल इंडिया हुक्मरानों का एक बहुत बड़ा सपना है. नोटबंदी के बाद से ही ऑनलाइन भुगतान का चलन बढ़ गया है या यूं कहें कि बढा दिया गया है. पेटीएम, भीम और इसी तरह की त्वरित भुगतान वाली कई ऐप्स बाजार में आ चुकी हैं जिनका इस्तेमाल लोग धड़ल्ले से कर रहे हैं. नकद लेनदेन की जगह अब ऑनलाइन भुगतान चलन में है और लोग बजाय बाजार जाने के घर बैठे ही उपभोक्ता उत्पाद खरीद रहे हैं. इस डिजिटल लेनेदेन से उपभोक्ताओं का समय भी बच रहा है और बैंक से पैसा निकाल कर भुगतान करने की जहमत से बचा जा रहा है और कई लोगों का इसमें जबरदस्त विश्वास भी है. लेकिन सवाल है कि क्या डिजिटल या ऑनलाइन लेन-देन पूरी तरह सुरक्षित सुरक्षित है? जवाब है- बिल्कुल नहीं। बडे धोखे हैं इस राह में।

पेश है यहाँ एक नमूना :

 

अब एटीएम भी चोरों  से सुरक्षित नहीं बचे हैं.  5 अगस्त की  रात सीलमपुर इलाके में  सधे हुए अपराधी  ने आईसीआईसीआई बैंक  के एटीएम से 25 लाख रूपयों पर हाथ साफ कर दिया. उसे इस काम को अंजाम देने में मात्र  दो मिनट लगे. उसने  एटीएम में बाकायदा  पासवर्ड  डालकर उसे खोला और नगदी की समूची ट्रे लेकर चलता बना. उसने कैश निकालने की भी जहमत नहीं उठाई. गौरतलब है कि यह घटना देश की राजधानी दिल्ली में घटी है.

पिछले साल यानी 2017 में एटीएम/क्रेडिट/डेबिट कार्ड और इन्टरनेट बैंकिंग की धोखाधड़ी से सम्बन्धित 25800 मामले दर्ज हुए. इन मामलों में 179 करोड़ रुपयों की हेराफेरी हुई. यह जानकारी रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया द्वारा आधिकारिक तौर पर दी गयी है. इनमें से 10,220 मामले तो 2017 की आखिरी तिमाही में – वह भी केवल 21 दिसंबर तक ही घटित हुए है. यह जानकारी आई. टी. मंत्री रविशंकर प्रसाद द्वारा राज्य सभा में एक लिखित उत्तर में दी गयी है.

और तो और, उक्त 179 करोड़ में से 111.85 करोड़ की राशि इसी तिमाही में इधर से उधर हुई है. 2017 में जनवरी से मार्च तक 3077,अप्रैल से जून तक 5148 और जुलाई से सितम्बर तक 7372 मामले घटित हुए. इन तीनों तिमाहियों में कुल 67.13 करोड़ की राशि का हेरफेर हुआ. ये आंकड़े दर्शाते हैं कि धोखाधड़ी के आयाम अंतिम तिमाही में काफी तेजी से बदले.

2016 में जून से सितम्बर तक 3156 मामले और अक्टूबर से दिसम्बर तक 4147 मामले दर्ज हुए जिनमे कुल 45.50 करोड़ की राशि ठगी गयी. जहां तक राज्यवार आंकड़ों का सवाल है,एक लाख रुपयों से ऊपर की रकम की ठगी में महाराष्ट्र सबसे ऊपर रहा जहाँ 12.10 करोड़ रुपयों के 380 मामले हुए. हरियाणा दूसरे स्थान पर रहा जहाँ 8.27 करोड़ के 238 मामले हुए, फिर कर्नाटक (9.16 करोड़ के 221 मामले ),फिर तमिलनाडु (4.38 करोड़ के 208 मामले) और दिल्ली अंतिम स्थान पर रहा जहाँ 3.53 करोड़ के 156 मामले हुए.

चौंका देने वाला तथ्य यह है कि 2004 से 2015 के बीच दस सालों में भारत में डिजिटल अपराधों में 19 गुना इजाफा हुआ है. इस वजह से भारत अमरीका और चीन के बाद इंटरनेट पर द्वेषी गतिविधियों (मेलिशियस एक्टिविटी) में तीसरा और द्वेषी कूटभाषा ( मेलिशियस कोड ) के सोर्स के रूप में दूसरे नंबर पर है. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार  डिजिटल अपराधों में 2005 में 569 एयर 2015 में 5752 लोग गिरफ्तार किए गए है.

ये आंकड़े सिर्फ एक ही तरह के मामलों के नहीं हैं. इनमें डिजिटल पहचान की चोरी, फ़ोन के जरिये जानकारी लेकर की गयी ठगी,हैकिंग के जरिये डिजिटल खातों में प्रवेश और रकम का ट्रान्सफर आदि भी शामिल हैं. ये आंकड़े हर तरह के डिजिटल अपराध के हैं और ये वे ही मामले हैं जो पुलिस को रिपोर्ट किए गए हैं. डिजिटल ठगी के शिकार हुए बहुत से लोग तो पुलिस में रिपोर्ट भी नहीं करते. मसलन फ़ोन पर की गयी क्रेडिट कार्ड धोखाधड़ी के मामलों में  अपराधी चूंकि शिकार को बैंक का अधिकारी बन कर जानकारी देने के लिए फुसला लेते हैं, और उन्हें वहीं का वहीं चूना लगा देते हैं,पुलिस भी उनका संज्ञान नहीं लेती. इन मामलों में शिकार खुद ही जानकारी देता है लिहाजा उसका कोई दावा भी नहीं बनता. अधिकतर मामलों में तो शिकार को पता ही नहीं चलता की कब उसका क्रेडिट कार्ड क्लोन हो गया. उसे तो तभी समझ में आता है जब रकम निकलने पर उसके रजिस्टर्ड मोबाइल पर एस.एम.एस. आता है.

सरकार का कहना है कि सोशल मीडिया का उपयोग भी डिजिटल अपराधों का एक कारगर हथियार बन चुका है और ये डिजिटल हमले देश और समाज को काफी प्रभावित कर रहे हैं. सरकार का दावा है कि वह इन अपराधों के प्रति जागरूक है. लेकिन उक्त आंकड़े सरकार के इस दावे का मखौल उड़ा रहे हैं.

स्थिति की भयावहता का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि पाकिस्तान की दुर्दांत खुफिया एजेंसी ने फेसबुक जैसे सोशल मीडिया पर ही सेना से जुड़े कुछ लोगों को हनीट्रेप में फंसा कर उनसे सेना की तैनाती जैसी महत्वपूर्ण जानकारियाँ निकलवा लीं. एक आकर्षक महिला की पहचान बनाकर उनसे दोस्ती का झांसा देकर ये सब करवाया गया.

डिजिटल इंडिया की सबसे बड़ी खामी है लोगों में डिजिटल जागरूकता का अभाव. मजेदार बात यह है कि इस दिशा में सरकार कुछ नहीं कर रही है सिवा विज्ञापन देने के. कम्प्यूटर साक्षर लोग तो फिर भी ठीक हैं,लेकिन एक बड़ा तबका निरक्षर और ग्रामीण लोगों का है. सरकार के पास उन्हें कंप्यूटर साक्षर बनाने की कोई योजना नहीं दिखाई देती.

(रवींद्र दुबे वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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