मौजूदा सत्ताधारी पार्टी की ओर से पिछली सरकारों द्वारा आजादी के 70 वर्षों में कुछ न किए जाने को लेकर बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं. लेकिन अब इसमें गंगा को गंदगी से आजादी की बातें कम ही सुनाई पड़ती हैं. वैसे तो निर्मल गंगा को लेकर बीते कई दशकों से योजनाएं-परियोजनाएं बन रही हैं. भारी-भरकम बजट भी आवंटित किया जाता है. दावे भी लंबे-चौड़े किए जाते रहे हैं. ज्यादा पहले न जाएं तो भी बीते चार वर्षों में भी वर्तमान सरकार की ओर से भी अक्सर यह कहा जाता रहा कि गंगा की सफाई उसके लिए सबसे अहम एजेंडों में से है. इसके बावजूद गंगा की सफाई की दिशा में कोई उल्लेखनीय काम नहीं किया जा सका. इससे भी ज्यादा विडंबना की स्थिति यह रही कि निर्मल होने की जगह गंगा और भी ज्यादा गंदी और प्रदूषित हो गई. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि आखिर गंगा को गंदगी और प्रदूषण से आजादी कब मिल पाएगी और क्या वह अपनी पुरानी पवित्रता और निर्मलता को प्राप्त कर सकेगी.

सबसे पहले यह जान लेने की जरूरत है कि सरकारी जानकारियों के अनुसार गंगा सफाई की क्या स्थिति है. इस बारे में सबसे अहम और आश्चर्यजनक जानकारी यह है कि सरकार को निर्मल गंगा के बारे में कुछ भी नहीं पता. एक आरटीआई के जवाब में यह पता चला है. अंदाजा लगाया जा सकता है कि जो पार्टी विपक्ष में रहते हुए सरकार की इस बात के लिए आलोचना करते नहीं थकती थी कि गंगा की सफाई के लिए कुछ नहीं किया जा रहा है. उसी की सरकार को चार साल बीत जाने के बाद भी यही नहीं पता गंगा कितनी साफ हुई. अभी गंगा मंत्रालय की जिममेदारी संभाल रहे नितिन गडकरी ने अब से करीब दो महीने पहले एक कार्यक्रम में भरोसा जताया था कि मार्च 2019 तक गंगा नदी के 80 प्रतिशत तक साफ हो जाएगी. उन्होंने यह भी बताया था कि गंगा को प्रदूषित कर रहे 251 उद्योगों को बंद किया जा चुका है. 938 उद्योगों से निकलने वाले प्रदूषण की मॉनिटरिंग की जा रही है. गंगा के रास्ते में पड़ने वाले 211 बड़े नालों की पहचान की गई है. यह जानकारी भी दी थी कि ‘नमामि गंगे’ के तहत अब तक 195 परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है. इसमें से 24 परियोजनाओं का काम पूरा हो चुका है. गडकरी बता रहे उपलब्धियां लेकिन सामने आ रह थीं कमियां. सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि जब 195 परियोजनाओं में से मात्र 24 पर ही काम पूरा हो पाया है, तो गंगा निर्मल कैसे हो सकेगी.

अब इस परिप्रेक्ष्य में थोड़ा वस्तुस्थिति को समझने की जरूरत है. सन 2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार आने के बाद जिन मुद्दों पर सर्वाधिक ध्यान दिया गया था उसमें एक निर्मल गंगा भी थी. प्रधानमंत्री बनने के बाद वाराणसी जाने पर मोदी ने कहा था कि मां गंगा ने मुझे बुलाया है. यह भी कहा था कि मां गंगा की सेवा करना मेरे भाग्य में है. तब नदी विकास और गंगा पुनरुद्धार मंत्री बनाई गई उमा भारती ने बड़ा दावा किया था कि तीन साल में गंगा साफ हो जाएगी. मोदी सरकार ने नमामि गंगे नाम की बहुप्रचारित योजना शुरू की थी. तब लोगों को लग रहा था कि मोदी सरकार और कुछ करे न करे, कम से कम गंगा को साफ जरूर कर देगी. लेकिन लोगों को यह कहां पता था कि यह सरकार अन्य तमाम बड़े मुद्दों की तरह इसके साथ भी वही व्यवहार करेगी. अब चार साल बीतने के बाद सरकार को गंगा की सफाई के बारे में कोई जानकारी तक नहीं है. एक आरटीआई के माध्यम से सामने आई जानकारी के बाद भी सरकार से कोई सवाल-जवाब क्यों नहीं किया जा रहा है कि आखिर नमामि गंगे का क्या हुआ.

अभी कुछ दिनों पहले ही एक आरटीआई पर सरकार की ओर से जवाब दिया गया कि उसे इस बारे में कोई जानकारी नहीं है कि गंगा सफाई पर कितना काम हुआ और गंगा कितनी साफ हुई. यह कितनी चौंकाने वाली बात है. यह उस सरकार का जवाब है जो खुद को गंगा की सबसे बड़ी हितैषी बताते नहीं थकती. आरटीआई जवाब के मुताबिक गंगा सफाई पर इस दौरान 3800 करोड़ रुपये खर्च हुए. इस बारे में भी कुछ दिलचस्प सरकारी आंकड़े हैं. गंगा पुनरुद्धार मंत्रालय के ही मुताबिक 2014-15 में 2,137 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया था. इसमें भी कटौती कर 2,053 कर दिया गया था. इसके अलावा, 1,700 करोड़ रुपये खर्च ही नहीं किए गए. 2015-16 में भी कुछ इसी तरह किया गया. गंगा सफाई के लिए 2,750 करोड़ का बजटीय प्रावधान तो किया गया लेकिन बाद इसे 1,650 कर दिया गया. इसमें से भी 18 करोड़ रुपये खर्च ही नहीं किए गए. यह उस सरकार के आंकड़े हैं जो बहुत दावे के साथ बताती है कि अब कोई भी योजना न अटकती है और न अटकाई जाती है. केवल काम किया जाता है. अगर काम किया जाता और योजना को अटकाया नहीं जाता, तो गंगा की कुछ तो सफाई हुई होती और सरकार को पता होता कि कितनी सफाई हुई. लेकिन जब योजना के लिए पैसा ही घटाया जाता रहेगा और आवंटित धन भी खर्च नहीं किया जाएगा, तो गंगा साफ कैसे होगी.

बात इतनी ही नहीं है. यहां यह भी जान लेना जरूरी है कि राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण की हुई तीन बैठकों में से केवल एक की अध्यक्षता ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की. दो बैठकों में गए ही नहीं. इसके अलावा, खुद को गंगा की सेविका बताने से न थकने वाली उमा भारती को गंगा मंत्रालय से हटा दिया गया और उस मंत्रालय को उन नितिन गडकरी को सौंप दिया गया जिनके पास सड़क और जहाजरानी मंत्रालय का बड़ा जिम्मा पहले से ही था. गडकरी यही कह कर काम चलाते रहते हैं कि नमामि गंगे योजना के तहत गंगा की सफाई में कोई कोर कसर नहीं छोड़ेंगे. उमा भारती कहती हैं कि गंगा सफाई पर धैर्य रखने की जरूरत है. वह यह भी बताती हैं कि नितिन गडकरी गंगा की सफाई की दिशा में अच्छा काम कर रहे हैं. सवाल यह है कि अगर अच्छा काम कर रहे होते, तो सरकार को भी उसके बारे में कुछ पता होता और वह बताती भी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से भी अब गंगा की सफाई को लेकर कोई बात नहीं की जाती. संभव है ऐसे तमाम मुद्दों की तरह अब उनके एजेंडे में गंगा की सफाई का मुद्दा न रह गया हो. 

गंगा की सफाई न हो पाना अपने आप में गंभीर चिंता का विषय है. गंगा की सफाई न होने से ज्यादा चिंताजनक उसका इस दौरान और ज्यादा गंदा हो जाना है. आंकड़े बताते हैं कि बीते चार सालों में गंगा और ज्यादा गंदी हो गई है तथा प्रदूषण बढ़ गया है. बीते साल भी एक आरटीआई से कुछ खुलासे हुए थे. इसके मुताबिक गंगा की सफाई तो दूर, पानी भी पीने लायक नहीं माना गया था. हरिद्वार में गंगा का पानी नहाने लायक भी नहीं रह गया है. एक जानकारी के मुताबिक गंगा में विष्ठा कोलिफॉर्म बैक्टीरिया में 58 प्रतिशत से ज्यादा की वृद्धि हुई है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में मालवीय ब्रिज के पास से लिए गए सैंपल में बैक्टीरिया आधिकारिक मानक से 20 गुना अधिक पाई गई थी. यह हालत 2017 में थी. अब तो उसमें इजाफा ही हुआ होगा. इलाहाबाद में भी गंगा की स्थिति कोई बहुत अच्छी नहीं बताई जाती. वहां अगले साल महाकुंभ लगने वाला है. उत्तर प्रदेश सरकार उसकी तैयारियों में लगी है, लेकिन शायद उसे भी गंगा में गंदगी और उसकी सफाई को लेकर किसी तरह की चिंता नहीं है.

गंगा की सफाई को लेकर सबसे पहले काम राजीव गांधी सरकार ने 1985-86 में शुरू किया था. उन्होंने गंगा कार्ययोजना की शुरुआत की थी. इस पर 15 वर्षों में करीब 901.71 करोड़ रुपये खर्च किए गए. इसके बाद भी गंगा में प्रदूषण कम नहीं हुआ. मार्च 2000 के योजना के पहले चरण को बंद घोषित कर दिया गया. दिसंबर 2009 में गंगा की सफाई के लिए विश्व बैंक से एक अरब डॉलर उधार देने की सहमति हुई. यह धन भारत सरकार की 2020 तक गंगा में अनुपचारित अपशिष्ट के निर्वहन का अंत करने की पहल का हिस्सा था. इससे पहले 1989 तक इसके पानी को पीने योग्य बनाने सहित नदी को साफकरने के प्रयास विफल रहे थे. गंगा को निर्मल बनाने के प्रयासों के तहत वर्ष 2008 में गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित किया गया था. सन 2000 से 2010 के बीच 2800 करोड़ रुपये की गंगा सफाई परियोजना पूरा होने के बाद भी गंगा में प्रदूषण के स्तर में कोई अंतर नहीं आया. तब से लेकर अब तक करोड़ों रुपये खर्च किए जा चुके हैं, लेकिन गंगा साफ होने की बजाय गंदी ही होती जा रही हैं. सितंबर 2014 में उच्चतम न्यायालय ने अदालत में केंद्र की ओर से पेश किए गए हलफनामे को बिल्कुल सरकारी बताते हुए कड़ी टिप्पणी की थी कि अगर यही हाल रहा तो गंगा की सफाई में 200 साल लग जाएंगे. क्या आने वाली पीढ़ियां गंगा को कभी उसकी पुरानी गरिमा के साथ देख पाएंगी. तब सॉलीसिटर जनरल रणजीत कुमार ने अदालत के समक्ष कहा था कि गंगा को साफ करने का काम 2018 तक पूरा कर लिया जाएगा. अब तो 2018 पूरा भी होने वाला है और सरकार को कोई जानकारी भी नहीं है.

गंगा का यह हाल उस भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार का है जो गंगा का उद्धार करना चाहती है. उसके लिए नमामि गंगे जैसी सात्विक परियोजना बनाती है. लेकिन चार साल में क्या किया गया, इसकी जानकारी तक जिसके पास नहीं है. विपक्ष में रहते हुए भाजपा की ओर से गंगा में गंदगी को लेकर कांग्रेस सरकारों को घेरा जाता रहा है. अब जब भाजपा की सरकार है, तब सरकार को ही गंगा की सफाई के बारे में कोई जानकारी न होना गंभीर चिंता का विषय ही कहा जाएगा. जाहिर है अगर सरकार की ओर से गंगा यात्रा ही निकाली जाती रहेगी, सारा जोर केवल गंगा आरती पर ही रहेगा, बजट घटाया जाता रहेगा, प्रधानमंत्री बैठकों में नहीं जाएंगे, मंत्री बदले जाते रहेंगे और गंगा सफाई की दिशा में कोई काम नहीं किया जाएगा, तो गंगा कैसे साफ होगी. सरकार और लोगों को समझना चाहिए कि केवल नमामि गंगे मिशन बना देने से गंगा साफ नहीं होगी. उसके लिए पूरी जिम्मेदारी और मिशनरी भावना से काम भी करना होगा जिसका सरकारों में अभी तक तो अभाव ही दिख रहा है. आजादी के इतने वर्षों बाद और अनेक परियोजनाए बनाने पर भी अगर साफ नहीं की जा सकी और गंगा में गंदगी और प्रदूषण बढ़ता ही जा रहा है, तो स्पष्ट है कि निर्मल गंगा और नमामि गंगे जैसी बातें दिखावे के अलावा और कुछ भी नहीं हैं.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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